Thursday, 29 October 2015

“ हाट और लोकजीवन ” / Weekly haat & People's life By Purusottam Singh Thakur

हाट और लोकजीवन

By Purusottam Singh Thakur

दूर दराज के क्षेत्र में साप्ताहिक हाट उस क्षेत्र के दर्पण की तरह होता है। हाट हमें स्थानीय समुदाय, उनके सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक संरचना, वहाँ के कृषि, आजीवीका,स्थानीय उत्पादन,व्यापार सहित लोकजीवन की झलकियाँ प्रस्तुत करती है।
आप कई बार गाँव गाँव घूम के जो सूचना या जानकारी इकठा नहीं कर पाते वह आप एक बाज़ार में घूमकर आसानी से पा सकते हैं। क्योंकि आप बाज़ार से उस क्षेत्र के लोगों के बारे में, वहाँ के कृषि उत्पादन के बारे में, बाहर से आने वाले उत्पादन के बारे में और लोगों के आवश्यकता और खरीदने की क्षमता के बारे में जानकारी पा सकते हैं और उन सब की विश्लेषण करके और भी पुख्ता जानकारी इकठा करसकते हैं। 
  
जाने माने पत्रकार पी.साईनाथ का कहना है की, “ साप्ताहिक हाटों में आप स्थानीय सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक जनजीवन की झलकियां भी देख सकते हैं।
इस प्रस्तुति के माध्यम से हम वह सब देखने की कोशिश तो करेंगे लेकिन हम यहाँ एक ऐसे हाट देखने जा रहे हैं जो हमारे आसपास के कई हाटों से थोड़ा हटके है।

हम बात कर रहे हैं इस पोस्टर में प्रस्तुत ओरछा हाट की। हम छत्तीसगढ़ में रहते हैं और हम सब को तो बस्तर के बारे में पता तो है ही। यहाँ की परिस्थिति से शायद ही कोई अनजान हो । शायद यहाँ की ज़मीनी हक़ीकतसे उतना न हों पर मीडिया से आनेवाले खबरों से तो जानकारी होगी ही ।

बस्तर के अबूझमाड़ क्षेत्र जंगली और पहाड़ी इलाका है जो 3,900 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। और यह नारायणपुर, बस्तर और बीजापुर जिलों में फैला हुआ है।
यह क्षेत्र भारत के ज्यादातर जनजातिओं का घर माना जाता है जहाँ गोंड, माड़िया, अबूझमाडिया, हलबा आदि जनजाति रहते हैं। यहाँ के ज्यादातर भौगोलिक क्षेत्र बाकी देश से अलग थलग रहा है और यह बाकी दुनिया के पहुँच से भी दूर है। 
यहाँ के ज्यादातर क्षेत्र तक सरकार की आजतक पहुँच नहीं है, इसे माओवादियों का लिबरेटेड जोन माना जाता है ।

नारायणपुर ज़िले में केवल दो विकासखंड हैं, एक नारायणपुर और दूसरा ओरछा । ज़िले में कूल 69 ग्राम अंचयत हैं जिनमें से 24 पंचायत ओरछा में है।
ज़िले के कूल 412 गाँव में से 237 गाँव अबूझमाड़ में हैं। 2011 के जनगणना के मुताबक अबूझमाड़ में नारायणपुर ज़िले का जनसंख्या 37,000 था। ओरछा विकासखंड में माड़िया जनजाति के लोगों की तादाद ज्यादा है जिनकी संख्या तकरीबन 23,000 है वहीं अनुसूचित जाती के लोग सिर्फ 1 से 2 % हैं वहीं पिछड़े हुए वर्ग में शासकीय कर्मचारी ही हैं।

 अबूझमाड़ के अंदर जाने के रास्ते ओरछा पहुँच कर खत्म हो जाते हैं। और आगे स्थानीय लोगों को छोड़ अंदर कोई जाता नहीं है, और स्थानीय लोग जंगल में पगडंडियों के सहारे एक गाँव से दूसरे गाँव पैदल ही सफर करते हैं। यहाँ तक की इस हाट में लोग 30 से 50 किमी दूर से पैदल ही आए थे।
क्षेत्र माना जाता है। और इतने बड़े क्षेत्र में ओरछा ही इकलौता बाज़ार है जहां इस क्षेत्र के लोग पूरी तरह से निर्भर हैं । 

हम बाज़ार में कई तरह के लोगों से मिले जिनमें कुदुल गाँव से आए जमदो से मिले जो यहाँ एक घंटा पैदल सफर तय करते हुए बाज़ार में केला बेचने आए थे।

20 किमी का सफर तय करके थुलथुली से राजम आए हुए हैं, वह कल रात बाज़ार में ही रुके थे। दरअसल यह बाज़ार यूं तो गुरुवार को होता है, लेकिन क्योंकि लोग बहुत ही दूरदराज़ से एक से 3 दिन पैदल चलकर आते हैं इसलिए कुछ लोग बाज़ार के पहले दिन आते हैं और बाज़ार करके दूसरे दिन सुबह लौट जाते हैं। एक दिन पहले आने वालों में ग्रामीण और व्यापारी सभी शामिल हैं। इसलिए बाज़ार के एक दिन पहले से ही बाज़ार शुरू हो जाता है और रात में चलता है ऐसा स्थानीय लोगों का कहना है। और दूर दराज से आए लोग रात में ही बाज़ार करके सुबह वापस चले जाते हैं।


यह बाज़ार कई माईने में अलग है। माओवादी इलाका होने की वजह से यहाँ बाज़ार में सुरक्षाबल भी तैनात रहते हैं जो ज्यादातर बाज़ार करते नज़र आते हैं और बाज़ार करने के बाद वापस चले जाते हैं। 

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